Tuesday, July 27, 2010

himachalimunda: फिल्म लम्हा में अभिनेता अनुपम खेर के ऐश से सम्बंधित चर्चित डायलोग पर

himachalimunda: फिल्म लम्हा में अभिनेता अनुपम खेर के ऐश से सम्बंधित चर्चित डायलोग पर

Wednesday, July 14, 2010

फिल्म लम्हा में अभिनेता अनुपम खेर के ऐश से सम्बंधित चर्चित डायलोग पर

फिल्मकार बंटी वालिया की नयी फिल्म लम्हा में एक संवाद है कि जब ऐश्वर्या रॉय चाँद नहीं देख पाती तो यह खबर बन जाती है लेकिन उन हजारों कश्मीरी औरतों की दशा को खबर क्यों नहीं बनाते जिन्हों ने बरसों से अपने पतिओं को नहीं देखा है। ज़ाहिर है कि इस संवाद के जरिये फिल्मकार ने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया है । हालाँकि इस डायलोग में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है . इसके बावजूद मीडिया ने इस डायलोग को ऐश की प्रतिष्ठा से जोड़कर जिस प्रकार आधारहीन विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है उस से इस संवाद में पूछे गए सवाल की अहमियत ही साबित होती है।
समाचार पत्र अमर उजाला के धर्मशाळा एडिशन के १४ जुलाई के अंक में कुल्लू के एक युवा पत्रकार की खबर उनके नाम से छपी है जिसे अखबारी भाषा में बाईलाईन खबर कहते हैं । इस खबर में युवा पत्रकार ने लम्हा फिल्म के डायलोग को इस प्रकार से पेश करने का प्रयास किया है मानो इस से ऐश की प्रतिष्ठा ही दांव पर लग गयी हो । उन्हों ने इस डायलोग के माध्यम से ऐश की खिल्ली उड़ाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि अभी तक ऐश खामोश है लेकिन जब वे पलटवार करेंगी तो क्या होगा। ( ऐसा लगता है जैसे ऐश के मुंह खोलते ही कोई राष्ट्रिय आपदा आ जाएगी ) इसके साथ ही पत्रकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पूछने पर ऐश ने ..नो कमेंट्स कहकर बात टाल दी है लेकिन साथ ही पाठकों को आगाह किया है कि ऐश ने भले ही कोई प्रतिक्रिया नहीं की है लेकिन उन्हें ऐश के ससुर अमिताभ बचन के ब्लॉग पर उनकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करना चाहिए । (मानो बच्चन साहिब ने उन्हें बता दिया हो कि वे शीघ्र ही ब्लॉग लिख कर डायलोग रायटर और फ़िल्मकार के विरुद्ध मोर्चा खोल कर जंग का ऐलान करेंगे )।
इस से पत्रकार महोदय क्या साबित करना चाहते हैं । अगर गौर से देखा जाए तो उस डायलोग में ऐश की नहीं बल्कि उन पत्रकारों की खिल्ली उडाई गयी है जो इस प्रकार की बेसिर पैर की ख़बरों के माध्यम से सनसनी फैलाने की कोशिश करते हैं । ख़बरों को अतिरंजित करने की प्रवृति पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

Wednesday, June 30, 2010

ऑनर किलिंग और मास ऑनर किलिंग

जिस तरह पिछले कुछ वर्षों से औंनेर किल्लिंग के मामले सामने आ रहे हैं उससे ऐसा लगता है मानो अचानक सारा राष्ट्र चिंतित हो गया है। इस पर क़ानून में संसोधन जैसी बातें भी हो रही हैं। खानदानी आन-बानऔर परिवार की इज्जत के नाम पर क़त्ल करने की सामंत वादी प्रवृति नयी नहीं है। लेकिन पिछले कुछ सालों में मिडिया के अधिक सक्रिय होने तथा मीडिया दवारा इसके लिए ऑनर किल्लिंग जैसा नया शब्द गढ़ने के बाद इन मामलों में लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है । हालांकि अब ऑनर किल्लिंग के लिए वैकल्पिक शब्द की तलाश के साथ यह शब्द स्वयंव चर्चा का विषय बन गया है । केंद्रीय क़ानून मंत्री ने भले ही इस पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से सख्त कानून बनाने की वकालत की हो लेकिन इसके पीछे के मनोविज्ञान को समझे बगैर कोई भी क़ानून कारगर सिद्ध होने वाला नहीं है । यदि परिवार या खानदान की इज्जत के सवाल पर किसी परिवार द्वारा अपने ही परवार के किसी सदस्य का क़त्ल किसी भी कीमत पर करना औंनेर किल्लिंग है तो जाति, धरम, समुदाय या क्षेत्रवाद के नाम पर ttdहोने वाले नरसंहार , दंगे-फसाद और कत्ले आम की वारदातों को किस पर्सेप्तिवमें देखा जाना चाहिए । यह ऑनर किल्लिग़ का विस्तार ही तो है , क्या इसे मॉस ऑनर किल्लिंग की संज्ञा देना उचित नहीं होगा । हमारी शिक्षा तथा परम्पराओं के मौखिक और लिखित इतिहास ने ऑनर किल्लिंग को आन बाण और शान के साथ जोड़ कर हमेशा से ग्लोरिफाई किया है। समाचार पत्रों व् टेलीविजन इन घटनाओं को देखकर गुनाहगारों को कोसने वाले अधिकाँश लोग अपनी बारी आने पर इन्ही लोगों के पक्ष में खड़े दीखते हैं। सदियों से आन-बान-शान की कबीलाई सोच के चलते इसे अलग नज़रिए से देखा जाता रहा है । लेकिन मिडिया द्वारा इसके लिए गढ़ेगए नए शब्द ऑनर किल्लिंग ने थोडा सा नज़रिया बदलने की संभावना पैदा की है। अफ़सोस है की समाधान की बजाये बुद्धिजीवी वर्ग इस्ले शाब्दिक अर्थों में उलझ कर इसके लिए वैकल्पिक शब्द पर ज्यादे बहस कर रहा है। जबकि इस पारिवारिक अथवा सामाजिक मॉस हिस्टीरिया की बीमारी के इलाज के लिए कानून के संशोधन से अधिक स्वस्थ शिक्षा ढाँचे की है। क्या इतिहास में ग्लोरिफाई की गयी ऐसी गाथाओं को इतिहास में ही दफ़न करने का वक्त नहीं आ गया है?

Thursday, April 29, 2010

खाप पंचायतें और हिन्दू समाज में समान गोत्रीय शादियाँ .

पिछले कुछ दिनों से खाप पंचायतें सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर अख़बारों की सुर्ख़ियों में छाई रही । हरयाणा के एक गाँव में अपने ही गोत्र में शादी करने के आरोप में एक लड़के और लड़की को खाप पंचायत के द्वारा सुनाये गए फैसले के आधार पर उनके परिजनों नें मौत के घाट उतार दिया । इस पर सुप्रीम कोर्र्ट ने कड़ा संज्ञान लेते हुए कातिलों को मौत की सज़ा तथा खाप पंचायत के प्रधान को उम्र कैद की सज़ा सुनायी। कुछ तथाकथित प्रगतिवादियों ने कोर्ट के फैसले पर संतोष ज़ाहिर करते हुए खाप पंचायतों के आस्तित्व पर पाबंदी लगाने की मांग भी उठायी। हालांकि खाप पंचायत के चंगेजी फरमान का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए लेकिन हिन्दू समाज की मान्यताओ के चलते एक ही गोत्र में लड़के लड़की की शादी का समर्थन भी कैसे किया जा सकता है? खाप पंचायतों को कई जगह खानगी पंचायत भी कहा जाता है। इन पंचायतों के माध्यम से गाँव व् इलाके के कई विवाद सुलझाने का काम भी बखूबी अंजाम दिया जाता रहा है । एक ही गोत्र या दूसरी जातिमें शादी करने पर मौत की सज़ा देना न्यायसांगत नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार के फैसले भावावेश में लिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि समाज में इस प्रकार के रिश्तों को पनपने से केसे रोका जाए। जो लोग मानवाधिकार कि दुहाई देते हुए इस प्रकार कि शादियों को जीवन के विशेषाधिकार के तहत किसी भी व्यक्ति का निजी फैसला बताकर जायज़ ठहराने का प्रयास करते हैं , क्या वे लोग इस प्रकार कि शादियों को अपने घरों में मान्यता देसकते हैं , क्या इस प्रकार कि शादियाँ आनुवंशिकी के लिहाज से भी उचित हैं ? यदि नहीं तो इस प्रकार के व्यवहार पर अंकुश लगाने के लिए क्या उपाय होने चाहिए। नियम और क़ानून समाज को शान्तिव्यवस्था के साथ एकजुट रखने के लिए बनाए जाते हैं । समय के साथ इनमे संशोधन भी होते रहते हैं । जब तक कोई भी सामाजिक कायदा कायम है तब तक इसका उलंघन करने वालों के लिए इसके अनुरूप सज़ा भी मुकरर की गयी है । दुर्भाग्यवश हमारे संविधान में हिन्दुओं की विवाह पद्धति को कहीं भी रेखांकित नहीं किया गया है । इसी खामी के चलते अज्ञानतावश खाप पंचायतें क्रूर फैसले देकर अपनी भड़ास निकालतीं हैं। वैश्वीकरण के इस संक्रमण काल में युवा वर्ग में समाज की पूर्व निर्धारित एवम स्थापित धारणाओं के प्रति विद्रोह पनप रहा है, जिसे नकारा नहीं नहीं जा सकता। लिव इन रिलेशनशिप की धारणा भी युवाओं की समाज के प्रति बदलती सोच का नतीजा है. अब समाज शास्त्रियों और विधिविशेषज्ञों का दायित्व बन जाता है कि वे इस पर गहनता से विचार करना आरम्भ करें।

Monday, July 7, 2008

चारों युगों का लेखा जोखा

भोर की पहली किरन के साथ

मंदिरों की घंटियाँ

मस्जिदों की अजान

लेकर आती है नए सतयुग की सुबह।

सतयुग की दहलीज लांघकर

त्रेता युग की मर्यादा का गठर लादे हुए

द्वापर के कर्मक्षेत्र की दोपहर में

प्रवेश किया जाता है , और छिड़ जाता है

महाभारत

एक जीवन संग्राम .

निति कुनीति के तरकश से

चलाये जाते हैं असंख्य तीर,

मूक दर्शक बना सूरज

शाम ढले तक

गीता का उपदेश बनकर

क्षितिज को रक्त रंजित करते हुए

मुंह छिपा लेता है।

तब आरम्भ होता है कलयुग का तांडव

देर रात तक

उचित अनुचित

नेतिकता -अनेतिका का अन्तर

मिटा दिया जाता है ।

और चारों युगों का कलंक लेकर

गहराता है ब्रह्म रात्री का भयावह अन्धकार

जहाँ सारा कोलाहल शून्य में विलीन हो जाता है

पुनः एक नए सतयुग की सुबह की प्रतीक्षा में.

यह सब निरंतर , निर्बाध जारी है.

Thursday, June 26, 2008

महिला संगठन महिलाओं के प्रति कितने जागरूक हैं!

महिला सशक्तिकरण व् घरेलू हिंसा जैसे विषयों पर आयोजित कार्यक्रमों में महिलाओं की अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से इन कार्यक्रमों में पुरूष नाममात्र भाग लेते हैं। इस तरह से ये आयोजन एक पक्षीय होकर रह जाते हैं। आम तौर पर यह भी देखा गया है की महिलाओं के अधिकारों की बात उठाने वाले अधिकांश संगठनों का नेतृत्व परित्यक्त अथवा अधिक उम्र की कुंवारी महिलाओं के हाथ चला जाता है। अधिकतर यह भी देखा गया है की इन सेमिनारों व् कार्यशालाओं से निकल कर आयी महिलाएं पुरुषों के विरुद्ध खड़ी हो जाती हैं। व्यवस्था की बजाय नारी का पुरूष विरोधी व्यवहार समाज के हित में कतई लाभकारी नहीं हो सकता है । घरेलू हिंसा तथा समाज में नारी की कमजोर स्थिति के लिए जिम्मेवार कारकों को तलाशने की आवश्यकता है। हालाँकि इस दिशा में बहुत काम हो चुका है लेकिन इसके निष्कर्षों से निकाल कर जो व्यवस्था दी जा रही है उसमें कई मनोवैज्ञानिक खामियां हैं। सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं के मध्यम से महिलाओं के लिए जो मंच प्रदान किया जा रहा है वह बेहद निराशाजनक तथा अतिरेकपूर्ण है। इसमें नारी को पुरुषों के खिलाफ खड़ा करने की कवायद चल रही है जबकि आवश्यकता पुरूष मानसिकता में बदलाव लाने की है जो नारी को दास अथवा दूसरे दर्जे का नागरिक मानता है। यह समझ सहस्राब्दियों से जारी पुरूष प्रधान समाज में पुरूष के अचेतन मन तक गहरी जड़ें जमा चुकी हैं। इस गुलामी का असर महिलाओं में भी कम नही है। महिला गोष्ठियों में आज भी पति परमेश्वर की धारणा पर चर्चा होती है। अपनी नियति व् पूर्व जन्मों के कर्मों का फल मानकर नारी स्वयं इस भ्रम को अंगीकार कर लेती हैं । धर्म व् जन्म कर्मों का भय दिखा कर पति ने स्वयम को परमेश्वर के स्थान पर स्थापित कर लिया है जबकि नारी को दासवत समर्पण के लिए मानसिक तौर पर गुलाम बना डाला है। स्वेच्छा से स्वीकार की गई परतंत्रता से मजबूत अन्य कोई भी गुलामी नहीं है। यदि यह बीमार मानसिकता है तो दूसरीऔर महिला अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठनों का नेतृत्व भी बीमार मानसिकता के हाथों में है जो समस्त पुरूष जाती को नारी का शत्रु मानकर चलती है। परिणाम स्वरुप परिवार टूटने तथा पत्नियों द्वारा पतियों को प्रताडित करने के मामले भी बढ़ रहे हैं । आवश्यकता रिश्तों में सामंजस्य स्थापित करने तथा पुरूष दृष्टिकोण को बदलने की है। लड़के व् लड़की के भेद को समाप्त करने के लिए माता पिता व् शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये जाने चाहिए । नसीहत देने की बजाय अपने आचरण में सुधार की प्रवृति विकसित करनी चाहिए । मसलन घर में कपड़े धोने, बर्तन साफ करने से लेकर वे सभी कार्य जो सामाजिक मान्यताओं के अनुसार लड़कियों के लिए निर्धारित किए गए हैं उनमें लड़कों की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए। पुरुषों की वेशभूषा की नक़ल करना, आधुनिकता के नाम पर शराब व् सिगरेट तथा अन्य व्यसनों का अनुकरण करना नारी को पुरुषों के समान नहीं बनाता। यह एक प्रकार से पुरुषों की विकृत मानसिकता के हाथों में खेलने जैसा है। यह नारी शोषण का अति सूक्ष्म रूप है। लेकिन इस से यह तात्पर्य नहीं है की नारी आक्रामक होकर पुरूष के विरुद्ध खड़ी हो जाए। यह मनोवैज्ञानिक समस्या है तथा इसके निवारण के लिए मनोवैज्ञनिक इलाज की आवश्यकता है ताकि समाज में नारी के आस्तित्व को इसकी सम्पूर्णता में स्वतंत्र रूप से स्वीकार किया जा सके।

हिमाचल के वनमंत्री के नाम एक पाती

हिमाचल सरकार की वन्य प्राणियों के प्रति चिंता जायज़ है लेकिन वनमंत्री जगत प्रकाश नड्डा द्वारा विशेष तौर पर बंदरों की सुरक्षा के लिए किए जा रहे उपाय उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवम व्यक्तित्व के विश्लेष्णात्मक गुण से सर्वथा विपरीत प्रतीत होते हैं। वनमंत्री यदि राजनैतिक एवम धार्मिक पूर्वाग्रहों से हटकर एक साधारण किसान के सरोकारों से जुड़कर विचार करे तो स्थिति अधिक स्पष्ट हो जाती हैबंदरो को भले ही प्रचलित मान्यताओ के अनुसार राम भक्त हनुमान की सेना के रूप में प्रचारित किया गया है और इसमें रामचरितमानस की विशेष भूमिका है। यहाँ इसकी सचाई अथवा इसके वैज्ञानिक आधार पर किसी प्रकार का शोध अथवा टिपण्णी करने की आवश्यकता नही समझता हु। इतना अवश्य है की समय की मांग के अनुसार आदिम काल से लेकर अब तक व्यक्ति व् समाज के हित में आस्थाओं व् मान्यताओं में व्यापक परिवर्तन लाये गए है। जिन सभ्यताओं ने समय की भाषा को नही समझा वे अतीत के गर्त में समां गए। हिंदुत्व किसी धर्म नही अपितु जिन्दगी जीने के एक फलसफे का नाम है जिसमे किसी प्रकार की कट्टरता के लिए स्थान नही है। ये हमें जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न कथाओं तथा गाथाओं द्वारा अलग अलग परिवेश में प्रतीकों व् उपमाओं के मध्यम से संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। विद्रूप यह है की लक्ष्य को देखने व् समझाने की वजाए हमने लक्ष्य को इंगित करने वाली उन्गलिओं को ही लक्ष्य मान कर इस पर अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है की इस पर किसी प्रकार की आलोचना भी बर्दाश्त नही कर सकते।

जीवन आगे बढ़ते रहने की प्रक्रिया है जिसमे विचारों व् मान्यताओं में बदलाव की गुंजाईश बनी रहती है येही विज्ञान व् प्रगति का नियम भी है कमोवेश हमारे वेदशास्त्रों की रचनाओं का आधार भी वैज्ञानिक है जिसमे युग.युगांतर से विचार व् मान्यताये संशोधित संस्करणों में समाज के सामने आती रही है लेकिन हम जड़ होकर जीवन जीने की बातें करतें है महाकाव्यों एवम धरम ग्रंथों में दर्शाए गए प्रतिक व् उपमाओं को उनके जड़ रूप में प्रतिपादित कर रहे है रामभक्त हनुमान के कथित वंशज बन्दर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उत्पाती जंगली जानवर ही हैं , जिन्हें राम के इस देश की जनता से कुछ लेना देना नही है। यह भी कटुसत्य है की जंगली जानवरों को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए मनुष्य जाती भी सामान रूप से दोषी है लेकिन इस गलती के सुधार के लिए लम्बी प्रक्रिया व् लंबे अन्तराल की आवश्यकता है। इस प्रतीक्षा में स्थिति के और अधिल विकराल होने का संकट भी है। बंदरों की बढाती संख्या ने जो विकराल स्थिति उत्पन्न की है इसका अनुमान उस किसान के खेत में जाकर लगाया जा सकता है जिसकी वर्ष भर की भोजन व्यवस्था को क्षण भर में तहस नहस कर दिया जाता है उस गृहिणी की आंखों के दर्द व् होठों से निकली बद्दुआ में प्रकट होता है जिसके सामने उसके नौनिहालों के मुह का निवाला पुरी दादागिरी के साथ कथित हनुमान की सेना द्वारा छीन लिया जाता है ये हनुमान नही अपितु उत्पाती बाली की उत्पाती सेना है जिसका संहार करने के लिए स्वयं भगवन राम ने धनुष उठाकर उसे अपने तीरों से बिंध डाला था। प्रदेश में सरकारी आंकडो के अनुसार करीब सादे चार लाख बन्दर है जबकि तीन साल पहले इनकी संख्या लगभग साथ हजार के आसपास थी। बंदरों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के बाद इनकी संख्या में निरंतर बढोतरी हुई है। अब स्थिति यह है की तीन परिवारों के पीछे एक बन्दर बैठा है वन निति में खामिओं के कारन वन्य प्राणियों ने आवास क्षेत्र की और रुख कर लिया है जंगलों में चीड जैसे पौधे लगाकर वनों की विविधता समाप्त कर दी है तथा वन्या प्राणियों के आश्रय के लिए जंगली फल तथा कंदमूल का आभाव पैदा हो गया शहरों व् गावों की और रुख करने के बाद अब इनकी भोजन सम्बन्धी आदते भी बदल गई ही जिन्हें सुधारने के पर्यास किए जा रहे हैं लेकिन इसमे काफ़ी समय लगेगा जबकि इस समस्या के लिए तुंरत कार्रवाई की आवश्यकता हे। इधर वनमंत्री जी को बंदरों के आहार में प्रोटीन और विटामिन्स शामिल करने की चिंता है लेकिन क्या कभी उन्हों ने प्रदेश के उन लाखों बचों का ख्याल किया हे जो कुपोषण का शिकार हे। उन बच्चियों की फ़िक्र की हे जो रक्ताल्पता के कारन अनेक बीमारियों का शिकार हो रही हैं बचाव में यह तर्क दिया जा सकता हे की ये वन मंत्रालय का कार्य नही हे। वन मंत्री होने के नाते उन्हें केवल वनों व् वन्य प्राणियों की चिंता करनी हे। भाजपा सरकार का मंत्री होने के कारन श्री राम की कथित बानर सेना की सुरक्षा की चिंता करना उनकी प्राथमिकता बन गया हे। लेकिन इसी तर्क पर यह पूछा जाना भी वाजिब हे की किसानों की फसलों को उजाड़ने में बराबर के जिम्मेवार सुवरों तथा चूहों के लिए वनमंत्री के एजेंडा में क्या हे , क्योंकि वे भी तो वराह अवतार के रूप में विष्णु के प्रतीक हैं तथा choohon की to प्रथम poojniy bhagwaan गणेश के रूप में पूजा होती है। यह भी kadwa सच है की देश का लाखों मन अनाज choohon dwaara बरबाद कर दिया जाता हैहालाँकि उन्हें मारने की अनुमति वन विभाग द्बारा किसानों को दे दी गयी हे लेकिन आवश्यकता वन विभाग के साथ कृषि तथा बागवानी विभागों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की हे।
यह नही है की प्रदेश के किसान पशु पक्षी प्रेमी नही हैं। गावों का किसान आज भी अपने भोजन से पहले चौखट पर कुत्तों व् बिल्लियों को रोटी का टुकडा डालता है अपने आँगन में चिडिओं के लिए दाना डालता है, कटोरे में उनके लिए पानी डालकर रखता है। अपने खेत में बीज डालने के बाद परमात्मा से दसों के भाग्य के लिए अनाज पैदा करने की प्रार्थना करता है अपने खलिहान से भिक्षुओं व् भिखारियों के लिए उनका हिस्सा अलग करके रखने की परम्परा आज भी विद्यमान है लेकिन येही किसान अपने खेत से एक भी डाली का नुक्सान करने वाले के प्रति रौद्र हो उठता है खेती के नुक्सान पर वोह अपने पड़ोसी पर लाठी भी उठा सकता है। यह हमारा ग्रामीण परिवेश तथा इसकी परम्पराएँ हैं। यदि क्षमा व् अभयदान की प्रवृति हमारी संस्कृति का अंग है तो अन्याय व् अत्याचार के विरुद्ध शास्त्र उठाना भी हमारा चारित्रिक गुन है। सीधी बात है की उत्पाती हो जाने पर किसी असामाजिक तत्व को फांसी पर चढाने में हिचक नहीं होती तो बंदरों के मामले में क्यों? यदि देश की सीमा पर विदेशी खतरा देखकर निरपराध सैनिक दूसरे देश के निरपराध सैनिक पर गोकि चलाने में संकोच नहीं करता तो बंदरों के प्रति क्यों? पर्यावरण स्नातुलन की दुहाई देने वालों को यह भी समझ लेना चाहिए की बन्दर तथा चूहों की कुछ प्रजातियाँ पर्यवार्नीय संतुलनबनाने की वजाए बिगाड़ने की स्थिति में पहुँच चुके हैं बंदरों के लिए अभ्यारण्य बनाने की पहल का नतीजा शिमला क्षेत्र के तारा देवी में देखने को मिल चुका है। जहाँ से सत्तर फीसदी बन्दर भाग कर निकटवर्ती गावों में उत्पात मचा रहे हैं। केवल नसबंदी अथवा नालबंदी समस्या का उपाय नहीं है। इसके किए वैज्ञानिक संहार तथा निर्यात पर प्रतिबन्ध हटाने जेसे कदम उठाने होंगे। राजनेतिक विवशता के चलते शायद वनमंत्री खुलकर इन सुझावों पर अमल कर सके लेकिन दिन के भोजन के बाद जब वनमंत्री एवम तथाकथित पशुप्रेमी संस्थाओं के पदाधिकारी वामकुक्षी मुद्रा में दोपहर को अपने अपने वातानुकूलित कक्षों में विश्राम करते हैं उस समय इस पर अवश्य विचार करें की कोई किसान कड़ी धुप में अथवा कडाके की ठण्ड व् बरसात में कथित राम्सेना से अपने खेतों की रक्षा के लिए अपने परिवार सहित संघर्षरत है। यह अवश्य विचार करें की विकसित देशों के वैज्ञानिक नए नए अनुसन्धान एवम पर्योगों के लिए बन्दर और अन्य जानवर उपलब्ध होने के कारण गरीब देशों के जीवित मनुष्यों पर प्रयोग कर रहे हैं उनका दावा है की ये अनुसंधान मनुष्य जाती के हित में किए जा रहे हैं जबकि सचाई यह है की पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के मद्देनज़र सादे सात अरब जनसँख्या से अधिक जनसंख्या भी पृथ्वी के लिए खतरा है। इसलिए इस संतुलन को बनाए रखने के लिए इस बहाने मनुष्य जाती की सैन्तिफिक कलिंग की जा रही है गरीब देश के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।